Sunday, January 12, 2020

New Year at Ganga Ji


Visit to Assi ghat, Ganga Ji for taking spiritual energy and blessings of God.

Sunday, May 5, 2019

खुशी का मूल्यांकन : हैप्पीनेस इंडेक्स


खुशी का मूल्यांकन : हैप्पीनेस इंडेक्स
भारतीय जीवन पद्धति उत्सव एवं उल्लास के साथ जिंदगी जीने की कला सिखाती है। “सर्वे भवंतु सुखना” की सोच लेकर हमें जीवन में आगे वढ़ना चाहिये। सभी की खुशी के लिये कार्य करना चाहिये। भारतीय संस्कृति में जरूरत से ज्यादा संग्रह करने बाले का नहीं बल्कि त्यागमय जीवन जीने बाले व्यक्ति को मह्त्व दिया जाता है। आधुनिक समय में खुशियों को भी हैप्पीनेस इंडेक्स से मापा जाने लगा है। इसी पर मैं अपने विचार कविता के माध्यम से प्रकट कर रहा हूं।

खुशियां बांटने से बढ़ती हैं, आइडिया भी बांटने से बढ़ता है।
लेकिन जीवन का गणित उल्टा है, यहां जोड़ने से नहीं
बल्कि कुछ भी घटाओ, इसी से हैप्पीनेस इंडेक्स बढ़ता है  
क्योंकि भारतीय संस्कृति में संग्रह नहीं त्याग महत्वपूर्ण है।

हमें चाहिये कि अपने लिये नहीं परिवार के लिये कुछ करें,
अपने लिये नहीं समाज के लिये कुछ करें,
अपने लिये नहीं देश और दुनिया के लिये कुछ करें,
जिससे पुन: बसुधैव कुटुम्बकम का सपना साकार हो।

अच्छे विचारों से हैप्पीनेस इंडेक्स बढे‌गा।
सकारात्मक सोच से हैप्पीनेस इंडेक्स बढे‌गा।
सबको साथ लेकर चलोगे तो हैप्पीनेस इंडेक्स बढे‌गा
जमीन से जुड़े रहोगे, अपनों से मिलते रहोगे तो
जीवन में हैप्पीनेस इंडेक्स अवश्य बढे‌गा ॥

जिंदगी की भागदौड़ में रुककर स्वमूल्यांकन भी जरूरी है अत:  
खुद को खुद के अंदर सर्च करो, कभी अपने ऊपर भी रिसर्च करो।

बच्चों में जैसे संस्कार डालोगे, परिणाम भी उसी अनुरूप आयेगा
वरना, स्कूल की फीस के बदले, बच्चे बृद्धाश्रम की फीस भर देंगे।  

आजकल लोग कामयाबी के पीछे जिंदगी भर दौड़ते रहते हैं। इसी पर डा. अनेकांत जैन ने लिखा था :
कुछ लोगों को कामयाबी में सुकून नजर आया
और बह दौड़ते ही चले गये।
हमें सुकून में कामयाबी नजर आयी, और हम ठहर गये।

शहरों के फ्लेट सिस्टम में
मनुष्य अधर में लटका है, ना छत अपनी ना जमीन अपनी,
फिर भी बाईफाई से देश और दुनिया से जुड़ा हुआ है
और एक क्लिक में सभी से ऑनलाइन सम्बंध बनाये है।
इसी में लाइक देखकर खुश भी हो जाता है। क्या यह नयी हैप्पीनेस है?

आज से कई वर्ष पूर्व हिंदी के राष्ट्र कवि श्री मैथली शरण गुप्त ने एक कविता
लिखी थी जिसका शीर्षक है :  नर हो न निराश करो मन को
यह रचना आज भी हम सभी के लिये प्रेरणादायी है :

नर हो, न निराश करो मन को, कुछ काम करो, कुछ काम करो
जग में रह कर कुछ नाम करो
, यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
, कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो
, न निराश करो मन को, नर हो, न निराश करो मन को॥

इसी कड़ी में एक और प्रेरणादायक कविता है:
लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती, कोशिश करने बालोंं की कभी हार नहीं होती
कुछ किये बिना ही जय जयकार नहीं होती, कोशिश करने बालोंं की कभी हार नहीं होती॥ (kavitakosh.org)

अत: हमें कभी भी जीवन में निराश नहीं होना चाहिये बल्कि हमेशा प्रयास जारी रखना चाहिये, एक ना एक दिन सफलता अवश्य मिलेगी। अत: हमेशा मस्त रहो, स्वस्थ्य रहो, खुशियां बांटो, और जीवन का आनंद लो। हैप्पीनेस इंडेक्स की चिन्ता मत करो यह तो स्वत: बहुत ऊपर चला जायेगा।

हमारे भारत देश का दिल आज भी गांव में बसता है। गांव का जीवन आज भी मिलनसार अपनेपन को लिये हुये है। अब गांव से शहरों की ओर पलायन नहीं बल्कि शहरों से गांव की ओर हेप्पीनेस के लिये जाना होगा ।

द्वारा : विवेकानंद जैन वाराणसी मो. 94505 38093

Wednesday, April 10, 2019

जैन धर्म बना विश्व धर्म


जैन धर्म बना विश्व धर्म : धार्मिक साहित्य का अंतर्राष्ट्रीयकरण
डा. विवेकानंद जैन, वाराणसी
वर्तमान में जैन धर्म के विस्तार एवं अंतर्राष्ट्रीयकरण में ऑनलाइन जैन डिजिटल ई-लाईब्रेरी (www.jainelibrary.com), इण्टरनेशनल दिगम्बर जैन ऑर्गेनाइजेशन (www.idjo.org), तथा इंटरनेट आधारित वेवसाइट का विशेष योगदान है। आज जैन धर्म तथा जैन साहित्य विश्व के 100 से भी अधिक देशों में डिजिटल लाईब्रेरी तथा इण्टरनेट के माध्यम से पहुंच रहा है अत: इण्टरनेट तथा धार्मिक टी.वी. चैनल भी जैनधर्म के प्रचार प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
जैन डिजिटल लाईब्रेरी: मैंने व्यक्तिगत रूप में जैन ई-लाइब्रेरी को जैन साहित्य की सामग्री के लिये बहुत ही उपयोगी पाया। यह लगातार विकास की ओर अग्रसर है। इस में हमेशा नयी सामग्री जुड़ती रहती है साथ ही नये नये उपयोगकर्ता भी देश विदेश से जुड़ते रहते हैं। इसके अलावा इण्टर्नेशनल दिगम्बर जैन ऑर्गेनाइजेशन की वेवसाइट भी बहुत उपयोगी है। इस पर भी ई-बुक्स उपलब्ध हैं।  
  


डिजिटल लाईब्रेरी ऑफ इण्डिया
इस वेवसाइट के माध्यम से अनेक ऐतिहासिक महत्व के धार्मिक, सामाजिक ग्रंथो को प्राप्त किया जा सकता है। इस पर उपलब्ध ग्रंथ नि:शुल्क हैं जिन्हें ऑनलाइन पढ़ा तथा आवश्यकतानुसार डाउनलोड भी किया जा सकता है। इस हेतु निम्न वेवसाइट देखें:  www.dli.gov.in or www.dli.ernet.in

इण्टर्नेट आरकाईव्स (https://archive.org/) : यह सभी प्रकार की डिजिटल सामग्री के लिये बहुत ही उपयोगी वेवसाइट है। इस पर भी जैन धर्म के प्राचीन ग्रंथ उपलब्ध हैं।


निष्कर्ष : जैन धर्म के सिद्दांतों को विश्व पटल पर लाने में आधुनिक सूचना तकनीकि का विशेष योगदान है। आज सूचना तकनीकि के प्रभाव से जैन धर्म सही मायने में विश्व धर्म बन गया है, जो कार्य धर्म के प्रचारक सदियों में नहीं कर सके, बह कार्य इण्टरनेट ने कर दिखाया।  
From: Dr. Vivekanand Jain, Deputy Librarian, Banaras Hindu University, Varanasi -221005 mob. 9450538093